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कोरोना घरवास


लाकडाउन में भारतीय पुलिस

जी धन्यवाद ! नमस्कार मित्रों !! क्या हाल-चाल है आपका ? इस घरवास में अपना तो सिर्फ खाना – सोना व्हाट्सएप ,  फेसबुक , गूगल समाचार , टीवी समाचार , रामायण और महाभारत सीरियल , थकने या पीठ दुखने के बाद फिर वही सोने और लेटने का कार्यक्रम , इस  सब में बहुत ही व्यस्त हूं फुर्सत नहीं है आपसे फोन पर भी बात करने के लिए बहुत-बहुत व्यस्त कार्यक्रम है आजकल का। घर से बाहर लक्ष्मण रेखा लांघने में भी बहुत डर लगता है । पता नहीं किधर से कोरोना नामक यमराज धर ले इसलिए घर से बाहर नहीं निकल रहा हूं । कभी – कभार  दवा की आवश्यकता से अगर मेडिकल स्टोर तक का सफर पूरा करना हुआ तो सैन्य वेशभूषा धारण करनी पड़ती है । सबसे पहले नाक और मुंह का बख्तरबंद फिर हाथ में सर्जरी ग्लव्स , सिर पर गमछा , पैर में जूता यानी अगर अपनी ही फोटो खींची जाए तो खुद ही अपने को पहचानना कठिन है , फिर रास्ते चलते 1 मीटर की सोशल डिस्टेंसिंग किसी से कोई बात नहीं । वैसे तो रास्ते में मित्रों के नाम पर सिर्फ कुत्ते , गधे और पुलिस वाले ही मिलते हैं कुत्ते देखते ही भौंकते हुए दूर भागते हैं पुलिस वाले मेडिकल का पर्चा देखने पर गला छोड़ते हैं और आगे बढ़ने पर गर्दभानन्द जी पूँछ हिला कर सिग्नल दे देते हैं कि जब उन दोनों ने पास कर ही दिया तो जाओ यार ! कोई बात नहीं है !!
     किसी तरह मेडिकल स्टोर से दवा लेकर लौटने के बाद घर के दरवाजे पर  फिर अगली दुर्दशा ……   सबसे पहले गमछा खोल कर वहां रखो •••   सावधानी से ग्लब्स को उतारना  ••• सारे कपड़े उतारो ••• और फिर नाक और मुंह का बख्तरबंद सावधानी से उतारो •••  सारे सामान कोने में रखो …… हाथ पैर अच्छी तरह से धुलो  फिर हैंड वाश से  दो बार हाथ रगड़ रगड़ कर धुलो ….. तब जाकर के घर में एंट्री । भैया ! इतनी दुर्दशा सिर्फ उस कोरोना जमराज के कारण ही  हो रही है लगता है जैसे मरघट से लौट रहा हूं ।


     इतने में  गांव से चतुरी काका का फोन आ गया पूछने पर वो भी वही गीत गाने लगे ….. भैया अइसन जीनगी हम कबो नाहीं जियले रहनी , एतना जिनिगी बीत गइल लेकिन अइसन घरबास हम कबो नाहीं कइले रहनी । रोज सुखले – सुखले लिट्टी-चोखा खात – खात मन उबिया गइल बा बाबू ! घर से बाहर निकलही के नईखे ,   बजारे जाही के नईखे , कउनो  महामारी अइल बा ….. लइका कुल बाहर भीतर घुमले से मना कर तान स । कह ताने स , की उ बुढवन के ढेरे धरता   •••   दादा अब जान कइसे बाँची ?  सोच – सोच के परनवाँ फरफरा ता ••••
    एही में  एक दिन जानता कर्फू रहे , एक दिन साँझी के बेरा में ताली , थाली अउर घन्टी बजवने स  आ फिर देख काल्हि अतवार के सुन तानी राती में नौ बजे अपनी – अपनी घरे कुल्ही दिया जरइहें स अब दादा देख हमार का हाल बा ई कुल्ही खाली टीवीए मोबाइल में व्यस्त रहताने स आ हमार दाढी झोंटा बढि गइलबा , भइया   का करीं  ? बेचना हजाम अवते नईखे उहो का करे बेचारा घरवा से निकली …. त ओहू के न कोरोनावा धरी हो    ••••

DR. SACHCHIDANAND SRIVASTVA View All

CLASSICAL HOMOEOPATHIC PHYSICIAN

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